BRICS Digital Payment: क्या डॉलर के दबदबे को मिलेगी चुनौती? जानिए भारत समेत BRICS की नई रणनीति
नई दिल्ली: BRICS देशों के बीच डिजिटल और सीमा-पार भुगतान व्यवस्था को बेहतर बनाने की कोशिश तेज हो रही है। इसका उद्देश्य अलग-अलग देशों की भुगतान प्रणालियों के बीच बेहतर कनेक्टिविटी विकसित करना, लेनदेन की लागत घटाना और अंतरराष्ट्रीय भुगतान को अधिक तेज और आसान बनाना है।
BRICS में Digital Payment को लेकर क्या हो रहा है?
BRICS Payment Task Force लंबे समय से ऐसे विकल्पों पर काम कर रहा है, जिनसे सदस्य देशों के बीच cross-border payments को अधिक कुशल बनाया जा सके। 2025 की BRICS घोषणा में payment systems की interoperability और तेज, कम लागत वाले सीमा-पार भुगतान को लेकर आगे काम करने पर सहमति जताई गई थी।
2026 में RBI गवर्नर ने भी बताया था कि BRICS देश अपने fast-payment systems और Central Bank Digital Currencies (CBDCs) को संभावित रूप से आपस में जोड़ने पर चर्चा कर रहे हैं। हालांकि, यह अभी चर्चा और तकनीकी मूल्यांकन के चरण में है।
भारत की UPI बन सकती है अहम कड़ी
भारत का UPI मॉडल इस पूरी चर्चा में खास महत्व रखता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में UPI को ज्यादा देशों के payment systems के साथ जोड़ने की जरूरत पर जोर दिया। अगस्त 2026 में UPI के जरिए अरबों लेनदेन हुए, जिससे भारत की डिजिटल पेमेंट क्षमता का वैश्विक स्तर पर महत्व बढ़ा है।
भारत और रूस के बीच भी रुपये और रूबल में भुगतान की व्यवस्था का इस्तेमाल बढ़ा है। इससे दोनों देशों के व्यापार में स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल की संभावनाएं मजबूत हुई हैं।
क्या इससे अमेरिकी डॉलर को सीधी चुनौती मिलेगी?
BRICS की payment initiatives को डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक संभावित कदम माना जाता है, लेकिन इसे अमेरिकी डॉलर के तत्काल विकल्प के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। खुद रूस ने सितंबर 2026 में कहा कि वह किसी खास मुद्रा से पूरी तरह दूर जाने की नीति नहीं अपना रहा है और विभिन्न भुगतान विकल्पों के लिए खुला है।
इसलिए फिलहाल ज्यादा सटीक तस्वीर यह है कि BRICS अपने सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं, डिजिटल भुगतान और cross-border payment connectivity को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
आगे क्या होगा?
अगर BRICS देशों की payment प्रणालियों के बीच प्रभावी interoperability विकसित होती है, तो व्यापार और अन्य सीमा-पार लेनदेन में लागत और समय कम हो सकता है। साथ ही, इससे सदस्य देशों को अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए ज्यादा विकल्प मिल सकते हैं।
हालांकि, तकनीकी compatibility, अलग-अलग देशों के वित्तीय नियम, डेटा सुरक्षा और व्यापार असंतुलन जैसी चुनौतियां अभी मौजूद हैं। इसलिए इसे डॉलर व्यवस्था के खत्म होने के बजाय वैश्विक भुगतान प्रणाली में एक अतिरिक्त विकल्प विकसित करने की कोशिश के रूप में देखना ज्यादा उचित है।
